भगवान श्री चित्रगुप्त : जीवन परिचयभगवान श्री चित्रगुप्त सनातन धर्म में ज्ञान, न्याय, सत्य और कर्मफल के अधिष्ठाता देव माने जाते हैं। पुराणों के अनुसार उनकी उत्पत्ति सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा की काया (शरीर) से हुई, इसलिए उन्हें "कायस्थों के आदिपुरुष" के रूप में भी सम्मान प्राप्त है। ब्रह्माजी ने उन्हें समस्त प्राणियों के शुभ और अशुभ कर्मों का निष्पक्ष लेखा-जोखा रखने का दायित्व सौंपा तथा धर्मराज यम के दिव्य सचिव और न्याय-सहायक के रूप में नियुक्त किया।भगवान श्री चित्रगुप्त के हाथों में सुशोभित कलम, दवात और बही-खाता ज्ञान, सत्य, विवेक और उत्तरदायित्व के प्रतीक हैं। उनका संदेश है कि मनुष्य का प्रत्येक विचार, वचन और कर्म जीवन की दिशा निर्धारित करता है तथा प्रत्येक कर्म का फल अवश्य प्राप्त होता है। इसी कारण वे न्याय, निष्पक्षता और नैतिक जीवन के शाश्वत प्रेरणास्रोत माने जाते हैं।भगवान श्री चित्रगुप्त की दिव्य परंपरा से प्रेरित कायस्थ समाज ने सदियों से शिक्षा, प्रशासन, न्याय, साहित्य, कला, विज्ञान और राष्ट्रसेवा के क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया है। आज भी भगवान श्री चित्रगुप्त सत्यनिष्ठा, ज्ञान, अनुशासन और लोककल्याण के आदर्शों के प्रतीक हैं। उनका जीवन-दर्शन हमें प्रेरित करता है कि हम अपने कर्मों को श्रेष्ठ बनाकर समाज, राष्ट्र और मानवता की सेवा में अपना योगदान दें।॥ श्री चित्रगुप्ताय नमः ॥
